मन का चोर | Hindi Poetry

Mann Ka Chor


“मन का चोर” takes you on a journey from what we were, to what we are. Nothing much has changed, though a lot has changed still.

 

Indian Independence

 

वजूद मेरे वतन का उसी दिन सिमट गया, जब मेरे मन का चोर गोरे को मिल गया

वजूद की लड़ाई मॆं जो खींची थी सरहद, दरिंदगी की मिसालों मॆं लाशों का था पर्वत

 

1857 मॆं थे मंगल पांडेय और थी रानी लक्ष्मी बाई,

अंजाम तक पहुँचते पहुँचते भगत सिंह से अशफ़ाक़ तक, सबने जान गवायी |

 

मेरे दिल का चोर, मन का मोर बन गया, मेरे मुल्क के टुकड़े तीन कर गया

सिया हमने जख़्मों को, सरहद पर बाँध  लगायी, मेरे मन के चोर ने फ़िर आवाज़ लगायी

कश्मीर उजड़ा ,आधा बिछड़ा, पंडितों ने फ़िर वजूद की जान गवायी,

84 ने अन्न दाता को फांसा, दिल्ली ने दिल से आग  लगायी |

 

मन के चोर ने मज़हबी दंगल को नया पाठ पढ़ाया, जात बिरादरी की आग मॆं आरक्षण का कपूर जलाया

हक जिनको मिलना था वो अब भी घास खा रहे हैं, जिनके पास थाल थी चाँदी की, वो मेरे वतन का मखौल उड़ा रहे हैं |

 

जब आदिवासी की बढ़ी उदासी, मेरे  मन के चोर ने दी नक्सलवाद की फांसी

ना हक मिला मगर जला घरौंदा, अनसुल्झी सी पहेली ने नस्लों को रौंदा

हुक्मरानों को सरकार की दरकार है, मेरे मन का चोर, इनका मीत, मेरे  लिये हार है |

 

91 मॆं वतन ने व्यापार का अलख जगाया, मेरे मन के चोर ने मुझे 92 मॆं झुलसाया

जब वतन सम्भलकर ऊंचाई चाह रहा था, मेरे मन के चोर को 2002 लुभा रहा था |

 

ना भूक की फांस चुभती है, ना चीखती गरीबी दिखती है, बेरोज़गारी नंगा नाच करती है, तब मालदा, मुज्जफरनगर क्रांति लगती है

बाबरी से दादरी तक मेरे चोर ने उत्पात मचाया, कभी राष्ट्रीयता,कभी धर्म, तो  कभी मजहब का चोला ओढ़ाया |

 

कुछ मुजाहिद बने, कुछ रक्षक; भक्षक तो अभी तक आज़ाद हैं,

मेरे मन के चोर की माने, हम सिर्फ वोट बैंक की बुनियाद हैं

ये बैंक हमसे ही उपजा है, हम ही को मिटायेगा,

सरकारी बंगलों मॆं नये नवेले बाबू बिठायेगा |

 

मेरे मन का चोर अपनी नफ़रत के साथ एक दिन सिधार जायेगा,

सरकारी दास्तांने किताबों मॆं होंगी, तुम्हारा अंजाम मनो सिफर रह जायेगा |

 

प्रवासी जो हो गये, सुकून मॆं तराने वतन के गा  रहे हैं, यहाँ तो इज्ज़त की रोटी को लोग फ़साना बता रहे हैं

ये मन का चोर जो गोरे ने बोया था,अब हुकमरानों ने काटा है, केहता विकास है, पर लहू बहाता है

हिन्दू, मुसलिम, सिख, ईसाई आपस मॆं सब भाई-भाई; किताबों से निकली ये पंक्ति अब दे रही है दुहाई,

चाहिये अब शासन की अगुवायी और शासकों से रिहायी |

 

विकासशील से विकसित देश तक की मेहेंदि जो है रचायी

तो बंधु मन के चोर की निश्चित करो विदाई |

 

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